ये कैसी शवयात्रा…नाचते-गाते श्मशान पहुंचे नाती-पोते

* 100 बरस की है ये जिदगी…श्मशान को भी फूलों से सजाया

“सदी का जीवन पूरा करने वाले इस बुजुर्ग को परिवार ने शायद यही संदेश देते हुए विदा किया—जिंदगी का अंत भले ही अंतिम हो, लेकिन अच्छी जिंदगी की यादें हमेशा साथ रहती हैं।”

किसी अपने के जाने का गम हर परिवार के लिए बेहद भारी होता है, लेकिन मध्यप्रदेश के देवास जिले में बागली विधानसभा क्षेत्र के करोंदिया गांव में 100 वर्षीय बाबूलाल जी की अंतिम विदाई कुछ ऐसी रही, जिसने हर किसी का ध्यान खींच लिया। अंतिम यात्रा में मातम के बीच नाती-पोते और परिवार के सदस्य नाचते-गाते नजर आए। फूलों से सजी डोल और सजाया गया श्मशान स्थल इस अंतिम यात्रा को और भी खास बना रहा था। जाट समाज के बुजुर्ग बाबूलाल जी ने 100 वर्ष की उम्र में अंतिम सांस ली। उनके निधन के बाद परिवार ने उन्हें परंपरागत तरीके से विदाई देने के बजाय उनके पूरे जीवन को उत्सव की तरह याद करने का फैसला किया।
अंतिम यात्रा के लिए डोल को विशेष रूप से सजाया गया। फूलों से सजी डोल जब गांव से निकली तो बड़ी संख्या में परिजन, रिश्तेदार और समाजजन साथ हो लिए। सबसे अलग नजारा उस समय दिखाई दिया, जब बाबूलाल जी के नाती-पोते और परिवार के सदस्य नाचते-गाते हुए अंतिम यात्रा में शामिल हुए।
सड़क किनारे खड़े ग्रामीण भी इस अनोखी विदाई को देखते रह गए। एक तरफ अपनों को खोने का दर्द था, तो दूसरी तरफ 100 साल का सफर पूरा करने वाले बुजुर्ग के जीवन को याद करने का संतोष।
परिजनों ने अंतिम संस्कार के लिए श्मशान स्थल को भी विशेष रूप से सजाया। उनका कहना था कि बाबूलाल जी ने जिंदगी के 100 बसंत देखे और भरपूर जीवन जिया। इसलिए उनके जाने के गम के साथ उनके लंबे जीवन का सम्मान भी होना चाहिए। इसी सोच के साथ परिवार ने उनकी अंतिम यात्रा को यादगार बनाने का निर्णय लिया।
करोंदिया की यह अंतिम यात्रा गांव में चर्चा का विषय बन गई। जहां अक्सर अंतिम यात्रा में सिर्फ आंसू दिखाई देते हैं, वहां बाबूलाल जी की विदाई में नाचते कदम और यादों की मुस्कान नजर आई। एक सदी का जीवन पूरा करने वाले इस बुजुर्ग को परिवार ने शायद यही संदेश देते हुए विदा किया—जिंदगी का अंत भले ही अंतिम हो, लेकिन अच्छी जिंदगी की यादें हमेशा साथ रहती हैं।