* 10-10 रुपये के सिक्कों से खरीदी एक्टिवा, तीन साल में जुटाए 1.23 लाख रुपये
जागरण उज्जैन। दस रुपये का सिक्का जेब में आए तो आमतौर पर लोग उसे चाय-नाश्ते या छोटी-मोटी खरीदारी में खर्च कर देते हैं, लेकिन तेलंगाना के एक पादरी ने इन्हीं सिक्कों को अपनी बड़ी खरीदारी का जरिया बना लिया। मंचेरियल जिले के लक्ष्मीपेट निवासी रवि जोसेफ ने तीन साल तक रोजमर्रा की खरीदारी से बचे 10-10 रुपये के सिक्के जमा किए। जब बचत का हिसाब लगाया तो रकम 1 लाख 23 हजार रुपये तक पहुंच गई। फिर जोसेफ इन सिक्कों को लेकर नई एक्टिवा खरीदने पहुंच गए। शोरूम में सिक्कों का इतना बड़ा ढेर देखकर कर्मचारी भी हैरान रह गए। सिक्के गिनने में करीब दो घंटे लगे और आखिरकार जोसेफ परिवार के साथ नई एक्टिवा लेकर घर लौटे।
रवि जोसेफ चर्च में पादरी हैं। वह सब्जियां, किराने का सामान और घर की दूसरी जरूरतें खरीदने के बाद बचने वाले 10 रुपये के सिक्के अलग रख देते थे। शुरुआत में यह बचत छोटी थी, लेकिन उन्होंने इसे खर्च करने के बजाय जमा करने की आदत बना लिया। दिन बीतते गए, सिक्के बढ़ते गए और तीन साल में यह रकम 1.23 लाख रुपये हो गई। जोसेफ जब लक्षेट्टिपेट के जगदंबा होंडा मोटर्स में सिक्के लेकर पहुंचे तो कर्मचारियों के लिए यह अनोखा अनुभव था। इतनी बड़ी संख्या में सिक्कों को गिनना आसान नहीं था। स्टाफ को रकम गिनने में करीब दो घंटे लग गए। गिनती पूरी होने पर भुगतान की राशि सामने आई और जोसेफ ने नई एक्टिवा खरीद ली। परिवार के साथ स्कूटी लेकर लौटने का यह अनोखा अंदाज स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
जोसेफ की बचत की आदत को लेकर शुरुआत में परिवार को भी संदेह था कि 10 रुपये के सिक्के जमा करके कितनी बड़ी रकम जुटाई जा सकती है। लेकिन उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा। धीरे-धीरे पत्नी और बच्चे भी इस मुहिम में साथ आ गए। तीन साल की लगातार बचत ने उनके सपने को पूरा कर दिया।
रवि जोसेफ की कहानी बताती है कि बचत की शुरुआत बड़ी रकम से ही हो, यह जरूरी नहीं है। नियमित रूप से छोटी राशि अलग रखने की आदत भी समय के साथ बड़ा परिणाम दे सकती है। जिन सिक्कों को लोग अक्सर मामूली समझकर खर्च कर देते हैं, उन्हीं से जोसेफ ने अपनी नई एक्टिवा खरीद ली।












