उज्जैन: 30 हजार किलो वजनी भैरव प्रतिमा कहां दिखाई देगी!

  • 20 करोड़ के मंदिर में आएंगे स्वर्णाकर्षण भैरव
  • दुनिया की पहली स्वर्णाकर्षण भैरव प्रतिमा तमिलनाडु के पत्थरों से आंध्रप्रदेश में के रही आकार, मध्यप्रदेश के उज्जैन में होगी स्थापित
  • मूर्ति निर्माण पर 30 लाख रुपये खर्च होंगे, शहर लाने पर खर्च होंगे 8 लाख
  • विश्व का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग भी परिसर में स्थापित
  • मिनी ब्रिज से होकर भक्त पहुंचते हैं मां प्रत्यंगिरा के पास, बन रहा 41 फीट ऊंचा राज शिखर

महाकाल नगरी उज्जैन में एक ऐसा धाम आकार ले चुका है, जहां कभी जंगल हुआ करता था और आज धर्म, आस्था और आध्यात्मिकता की गूंज सुनाई देती है। कालभैरव मंदिर मार्ग पर स्थित मां बगलामुखी धाम अपनी दक्षिण भारतीय स्थापत्य शैली, भव्य मंदिर और अनूठी धार्मिक संरचना के कारण श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बन रहा है। करीब 20 करोड़ रुपये की लागत से बने इस मंदिर परिसर में मां दुर्गा के दस रूपों और दस महाविद्याओं के दर्शन का अवसर मिलता है। अब जल्द ही दुनिया की पहली स्वर्णाकर्षण भैरव प्रतिमा तमिलनाडु के पत्थरों से आंध्रप्रदेश में आकार ले रही जो मध्यप्रदेश के उज्जैन में इसी धाम में स्थापित होगी। विश्व का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग भी परिसर में स्थापित है।


लगभग 10 एकड़ में फैले इस धाम में आस्था के साथ स्थापत्य की भव्यता भी देखने को मिलती है। यहां आने पर ऐसा लगता है मानो आंध्रप्रदेश के किसी मंदिर में आ गए। दक्षिण शैली का प्रवेश द्वार और उसी तरह का रंग रोगन। मंदिर के प्रमुख महंत रामनाथ महाराज के शिष्य चैतन्याचार्य जी बताते हैं मां बगलामुखी धाम की भव्यता में जल्द एक और आकर्षण जुड़ने जा रहा है। यहां स्वर्णाकर्षण भैरव की विशाल प्रतिमा स्थापित करने की तैयारी है। प्रतिमा का निर्माण आंध्र प्रदेश में तमिलनाडु के पत्थरों से किया जा रहा है। इसका वजन करीब 30 हजार किलोग्राम और ऊंचाई 21 फुट है। इसके निर्माण पर लगभग 30 लाख रुपये खर्च होने का अनुमान है, जबकि इसे उज्जैन लाने पर करीब आठ लाख रुपये का खर्च आएगा। प्रतिमा की स्थापना के बाद श्रद्धालुओं को धाम में भैरव के इस भव्य स्वरूप के दर्शन का अवसर मिलेगा। वर्तमान में 41 फीट ऊंचा राज शिखर प्रवेश द्वार बनने जा रहा है, जिससे होकर श्रद्धालु मां बगुलामुखी धाम पहुंच सकेंगे। इसके बाद मिनी ब्रिज से होकर मां प्रत्यंगिरा और स्फटिक शिवलिंग के दर्शन कर सकेंगे। चैतन्याचार्य जी ने दावा किया कि यह विश्व का सबसे बड़ा स्फटिक शिवलिंग है। यह तीन फीट का है। महाकाल की नगरी में विकसित हुआ यह धाम उज्जैन की धार्मिक पहचान में एक नया अध्याय जोड़ रहा है। कभी जंगल रहे क्षेत्र में आज आस्था और भक्ति का वातावरण है। यहां बनी भोजनशाला का स्थापत्य भी अनूठा है। ऊंचे स्तंभों पर सर्प की आकृति बनाई गई है। मंदिर वृद्धाश्रम भी चलाता है और गुरुकुल भी।

एक परिसर में दस महाविद्याओं के दर्शन

मां बगलामुखी धाम की विशेषता केवल इसकी विशालता या स्थापत्य तक सीमित नहीं है। यहां मां दुर्गा के दस रूपों और दस महाविद्याओं के दर्शन भी श्रद्धालुओं के लिए महत्वपूर्ण आकर्षण हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दस महाविद्याएं देवी शक्ति के अलग-अलग स्वरूपों का प्रतिनिधित्व करती हैं। यही वजह है कि यह धाम देवी उपासना में रुचि रखने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है।


मर्सिडीज में घूमते हैं पर सादगी ऐसी कि कोई यकीन न कर सके

चैतन्याचार्य जी वैसे तो महंगी मर्सिडीज में घूमते हैं लेकिन उनकी सादगी और सरलता से कोई यकीन नहीं कर सकता। वे मंदिर में एक साधारण सेवक के रूप में दिखाई देते हैं। वे कहते हैं सब गुरु कृपा है। भर्तृहरि गुफा के पीर महंत रामनाथ जी को गुरु मानकर पूजते हैं और उन्हीं के चित्र पूरे मंदिर परिसर में दिखाई देते हैं। उन्होंने बताया सात साल पहले यह जमीन एक जंगल के रूप में थी। धीरे धीरे इसे मां बगुलामुखी धाम के रूप में विकसित किया। इस पर 20 करोड़ रुपये से ज्यादा खर्च किए जा चुके हैं। स्वर्णाकर्षण भैरव प्रतिमा भी आकार ले रही है।