इंदौर से रिपोर्ट
इंदौर के एलआईजी चौराहा से नवलखा चौराहा तक प्रस्तावित एलिवेटेड कॉरिडोर परियोजना को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में बुधवार को सवा घंटे से अधिक समय तक अंतिम बहस हुई। शासन की ओर से परियोजना का वीडियो प्रस्तुतिकरण (प्रेजेंटेशन) कोर्ट के सामने रखा गया, जबकि याचिकाकर्ता अतुल शेठ की ओर से परियोजना की उपयोगिता, लागत और तकनीकी पहलुओं पर गंभीर सवाल उठाए गए।
याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि इतनी बड़ी और महंगी परियोजना की जमीनी उपयोगिता केवल वीडियो प्रस्तुतिकरण के आधार पर तय नहीं की जा सकती। करीब 350 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाली परियोजना में डिजाइन में बदलाव और अन्य खर्च जुड़ने पर लागत 700 से 750 करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका भी जताई गई।
बहस के दौरान परियोजना के जीएडी (जनरल अरेंजमेंट ड्रॉइंग) पर लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) के मुख्य अभियंता के हस्ताक्षर, एक्रोपोलिस की ट्रैफिक सर्वे रिपोर्ट और एसजीएसआईटीएस की ओर से उठाई गई आपत्तियों का मुद्दा भी सामने आया। याचिकाकर्ता ने पूरे प्रोजेक्ट का स्वतंत्र और विस्तृत तकनीकी अध्ययन कराने के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित करने की मांग की।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क रहा कि शहर की यातायात समस्या केवल सड़कों की लेन कम होने से नहीं, बल्कि प्रमुख चौराहों पर वाहनों की क्रॉसिंग से अधिक जुड़ी है। प्रस्तुत अध्ययन के आधार पर एलिवेटेड कॉरिडोर की उपयोगिता 10 प्रतिशत से भी कम होने का दावा किया गया। इसके मुकाबले अलग-अलग प्रमुख चौराहों पर फ्लाईओवर बनाने से 42 प्रतिशत से अधिक उपयोगिता मिलने की बात कही गई।
कोर्ट ने मांगा तर्कों का संक्षिप्त विवरण
शासन पक्ष की दलीलें सुनने और परियोजना से जुड़े तकनीकी, यातायात, लागत एवं उपयोगिता संबंधी आपत्तियों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता से तर्कों का सिनॉप्सिस (संक्षिप्त विवरण) प्रस्तुत करने को कहा है। अब याचिकाकर्ता की ओर से प्रमुख तकनीकी और कानूनी बिंदुओं का संक्षिप्त विवरण कोर्ट में पेश किया जाएगा। इसके बाद मामले में आगे की सुनवाई होगी और परियोजना को लेकर न्यायालय के रुख पर स्थिति और स्पष्ट हो सकेगी।
एलिवेटेड कॉरिडोर पर हाईकोर्ट में सवा घंटे चली बहस










