* भारत तिब्बत समन्वय संघ ने कहा 23 जनवरी को होगी अखंड पूजा

मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक स्थल भोजशाला में करीब दस साल बाद फिर पूजा और इबादत को लेकर दो पक्ष सामने आ रहे हैं। ऐसे में महाकाल नगरी उज्जैन की धरती से भारत तिब्बत समन्वय संघ ने बसंत पंचमी पर होने वाली सरस्वती पूजा का समर्थन कर कहा है कि भोजशाला में अखंड पूजा खंडित नहीं होना चाहिए और लंदन से मां सारस्वती की प्रतिमा लाकर स्थापित करनी चाहिए। की प्राण प्रतिष्ठा कर विराजित करना चाहिए। आने वाली 23 जनवरी को भोजशाला में अखंड पूजा होगी।
धार की ऐतिहासिक और विवादित भोजशाला में 23 जनवरी को लेकर हलचल बढ़ गई है। इस दिन बसंत पूजा और जुमा (शुक्रवार) साथ साथ आ रहे। इस कारण प्रशासन अलर्ट पर हैं। इंदौर रेंज के आईजी अनुराग मंगलवार को सुरक्षा व्यवस्था का निरीक्षण कर चुके हैं। भोज उत्सव समिति के संरक्षक अशोक जैन ने कहा है कि बसंत पंचमी के दिन सरस्वती पूजा करना हमारा लक्ष्य है। पूजा सूर्योदय से आरंभ होगी और लगातार होगी। अगर ऐसा नहीं होता है तो हम विरोध प्रदर्शन करेंगे। जैन ने यह भी साफ साफ कह दिया है कि हम भोजशाला परिसर किसी कीमत पर खाली नहीं करेंगे। दूसरी ओर मुस्लिम समुदाय ने शुक्रवार होने के कारण इस दिन (23 जनवरी) दोपहर 1 से 3 बजे के बीच नमाज पढ़ने की अनुमति मांगी है और इस सिलसिले में ज्ञापन भी दिया है। पुलिस प्रशासन इस कारण सुरक्षा व्यवस्था की तैयारी में जुटा हुआ है। धार शहर में सीसीटीवी कैमरों से नज़र रखी जाएगी।

इस हलचल के बीच भारत तिब्बत समन्वय संघ के मालवा प्रांत अध्यक्ष शिवेंद्र तिवारी ने कहा है कि भोजशाला मां सरस्वती का मंदिर है। वहां के खंबे और पत्थर चीख-चीख कर कर रहे हैं कि मां सरस्वती के मंदिर को तोड़ा गया है। संघ के केंद्रीय संयोजक हेमेंद्र प्रताप सिंह तोमर के नेतृत्व में संघ के पदाधिकारियो व कार्यकर्ताओं ने धार जाकर भोजशाला का अवलोकन किया।इस दौरान देखा गया है कि भोजशाला का खंभा और उस पर उकेरे गए प्रतीक चिह्न स्पष्ट बता रहे हैं कि यहां मां सरस्वती का मंदिर था। तिवारी ने बताया कि अवलोकन के बाद केंद्रीय संयोजक तोमर ने कहा है कि बसंत पंचमी पर भोजशाला में अखंड पूजा होना चाहिए और किसी भी प्रकार से इसे खंडित नहीं किया जाना चाहिए। संघ के प्रांत अध्यक्ष तिवारी ने कहा है कि मां सरस्वती की प्रतिमा जो लंदन के म्यूजियम में है उसे वापस लाया जाकर विधि विधान से भोजशाला में ही प्राण प्रतिष्ठा की जाना चाहिए। भोजशाला अवलोकन के दौरान भारत तिब्बत समन्वय संघ महिला विभाग की राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रो. शालिनी चतुर्वेदी (प्रयागराज), राष्ट्रीय सह मंत्री निर्माण सोलंकी (देवास), क्षेत्र अध्यक्ष आलोक मिश्रा (जबलपुर), युवा विभाग राष्ट्रीय मंत्री मदन अंबेकर (अकोला), बलराज नवानी (बुरहानपुर), डॉ. विवेक नाथ त्रिपाठी (लखनऊ), दुर्गा प्रसाद सिंह (उन्नाव), राजाभाऊ भदाने, देवेंद्र सोनोने सहित कई सनातन प्रेमी साथ थे। इससे 23 जनवरी का दिन धार प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा जैसा होगा। 2016 में भी बसंत पंचमी के दिन शुक्रवार होने के कारण विवाद हुआ था।
जानिए भोजशाला इतिहास

* धार में हजार साल पहले परमार वंश का शासन था, जहां 1000 से 1055 ईस्वी तक राजा भोज ने शासन किया।
* राजा भोज सरस्वती देवी के अनन्य भक्त थे और उन्होंने 1034 ईस्वी में यहां एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे बाद में ‘भोजशाला’ के नाम से जाना जाने लगा।
* इसे हिंदू सरस्वती मंदिर भी मानते थे। 1875 में यहां खुदाई में सरस्वती देवी की प्रतिमा निकली थी।
* इस प्रतिमा को मेजर किनकेड नाम का अंग्रेज लंदन ले गया। तब से यह प्रतिमा लंदन के संग्रहालय में है।
* हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में इस प्रतिमा को लंदन से वापस लाए जाने की मांग भी की गई है।
10 प्वाइंट में जानिए क्या है अधिकार का विवाद
1. धार जिले में स्थित भोजशाला को हिन्दू सरस्वती मंदिर मानते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय कमाल मौलाना मस्जिद मानता है।
2. कहते हैं कि यह स्थान राजा भोज द्वारा स्थापित किया गया था, लेकिन बाद में मस्जिद में बदल गया।
3. दोनों पक्ष इस पर अपना अपना अधिकार मानते हैं, जिससे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) सर्वे और कानूनी लड़ाई चल रही है।
4. वर्तमान में मंगलवार के दिन हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिमों को नमाज पढ़ने की अनुमति है। इसे हिंदू पक्ष चुनौती दे रहा है।
5. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट मामले की सुनवाई कर रहा है। परिसर की मूल स्थिति जानने के लिए वैज्ञानिक सर्वेक्षण (कार्बन डेटिंग) की मांग की गई है।
6. 1909 में धार रियासत ने भोजशाला को संरक्षित स्मारक घोषित कर दिया। बाद में इसे पुरातत्व विभाग को सौंप दिया गया।
7. देखरेख की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग के पास ही है। धार रियासत ने ही 1935 में यहां शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी थी।
8. पहले भोजशाला शुक्रवार को ही खुलती थी।
9. 1995 में विवाद के बाद मंगलवार को पूजा और शुक्रवार को नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई।
10. 2003 में भोजशाला को पर्यटकों के लिए भी खोल दिया गया।
